Ved in hindi – वेद क्या है || जानिए Ved kitne prakar ke hote hain

Ved in hindi – वेद क्या है || जानिए Ved kitne prakar ke hote hain

Table of Contents

Namskar Mitro Aaj hum apke liye laye hai ved in hindi jisme hum cover karege apke maan ke unn sabhi prashno ko jaise ki ved kya hai ? Ved kitne prakar ke hai ? Ved ka arth ? Ved ka dusra nam kya hai ? etyadi sab prashna. Chaliye Hum apke inhi sab prashno ko dyan mei rakhte hue unka uttar dena ki kosis karte hai.

Click on the link to visit our website-Hindiforu.in

Ved in hindi lets start……..⇒⇒

वेद क्या है ? – वेद का अर्थ ||ved ka arth 

Ved भारत के प्राचीन सभ्यता का प्राचीन ग्रंथ हैं। प्राचीन काल में रचित वेद यह काफी विशाल ग्रंथ है। वेद संस्कृत भाषा में लिखा गया है जिसे ‘वैदिक संस्कृत’ कहां जाता है। वेद हिंदुओं का धर्म ग्रंथ है। वेदों को “अपौरुषेय” माना जाता है।

Ved in hindi - वेद क्या है जानिए Ved kitne prakar ke hote hain

अपौरुषेयका अर्थ है- जिसे कोई व्यक्ति ना कर सकता हो। वेदों को ब्रह्मा जी ने रचित किया है ऐसा माना जाता है। इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है सुना हुआ।

वेद यह शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है। ‘विद्’ धातु यह शब्द से वेद बना है। वेद शब्द का यदि हम अर्थ समझे तो उसका अर्थ होता है “ज्ञान का ग्रंथ”।

ved ke prakar चार है। परंतु इन चारों को मिलाकर एक ही ‘वेद ग्रंथ’ समझा जाता है।

एक एव पुरा वेद: प्रणव: सर्ववाङ्मय – महाभारत

वेद को बाद में पढ़ना बहुत ही कठिन प्रतीत होने लगा इसी कारण एक वेद को तीन या चार हिस्सों में विभाजन किया गया। तब उनको ‘वेदत्रयी’ अथवा ‘चतुर्वेद’ कहने लगे।प्राचीनकाल में वेद शब्द जैसे चमत्कारी था। वर्तमान काल में विज्ञान भी वैसा ही चमत्कारी है।उस समय चारों वेद विशुद्ध ज्ञान-विज्ञान एवं विद्या के द्योतक थे।

Ved kitne prakar ke hote hain-4 ved in hindi

⇒Char Prakar ke ved hote hain

वेदों के प्रकार
वेद कुल चार प्रकार के हैं। चार वेदों के नाम –   
1. ऋग्वेद                                                                      
2. सामवेद
3. यजुर्वेद
4.अथर्ववेद

Ved in hindi - वेद क्या है जानिए Ved kitne prakar ke hote hain
Ved kitne prakar ke hote hain

आइए मित्रों हम विस्तार रूप से देख लेते हैं वेदों के इन चार प्रकार को।

ऋग्वेद

वेदों की उत्पत्ति ऋग्वेद से हुई। ऋग्वेद यह सर्वप्रथम निर्माण होने वाला वेद है। यह वेद पद्यात्मक है। हालांकि सामवेद गीतात्मक है और यजुर्वेद गद्यमय है। ऋग्वेद में कुल 10 मंडल है। 11000 मंत्र है और 1028 सूक्त है। इनके 5 शाखायें हैं- शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन ।

औषधि सूक्त ऋग्वेद के दशम मण्डल में हैं।अर्थशास्त्र ऋषि इसके प्रणेता है। इनमें कुल औषधियों की संख्या 125 है जो 107 स्थानों पर पाई जाती है। सोम का विशेष वर्णन औषधियों में किया गया है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने का कथानक भी उद्धृत है।
औषधियों से रोगों का नाश करना भी समाविष्ट है । इनमें वायु चिकित्सा,जल चिकित्सा,सौर चिकित्सा हवन द्वारा चिकित्सा तथा मानव चिकित्सा का समावेश हैं।

सामवेद

तीसरे क्रम में आने वाले वेद का नाम है सामवेद। परंतु एक मंत्र जो ऋग्वेद में मौजूद है उसमें ऋग्वेद के पहले सामवेद का नाम आने से कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जब वेद निर्माण हुआ। वह एक क्रम में ना होकर स्वतंत्र निर्माण किया गया। सामवेद में गेय छंदों की बहुत महत्वता हैं जिनका उपयोग यज्ञ के समय किए जाने वाले गान में होता था। इस वेद में 1824 मंत्रों में से 75 मंत्र छोड़कर बाकी सभी मंत्र ऋग्वेद से ही संकलित हैं।

संगीत शास्त्र का मूल इसी वेद को माना जाता है। देवता जैसे सविता,अग्नि,इंद्र इनका इसमें प्राधान्य है। इसमें संगीतमय मंत्र है जिसे यज्ञ के समय गाया जाता है। मुख्यतः यह वेद गन्धर्व लोगों के लिए होता है। इसके तीन मुख्य शाखाएं हैं तथा 75 ऋचायें हैं और विशेषकर संगीतशास्त्र का समावेश किया गया है ।

यजुर्वेद

यजुर्वेद में गद्य मन्त्र हैं,जो कि यज्ञ की असल प्रक्रिया है। मुख्यता यह वेद क्षत्रियों के लिए होता है। यजुर्वेद के दो भाग हैं-1.कृष्ण : वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है । कृष्ण की चार शाखायें है।
2.शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है ।इस की दो शाखाएं हैं। इसमें कुल 40 अध्याय का समावेश है। यजुर्वेद के एक मन्त्र में ‘ब्रीहिधान्यों’ का वर्णन प्राप्त होता है । कृषि विज्ञान एवं दिव्य वैद्य भी इसमें शामिल है।

अथर्ववेद

अथर्ववेद में चमत्कार,जादू,आरोग्य, यज्ञ के लिये मन्त्र उपलब्ध है। यह वेद विशेषकर व्यापारियों के लिए है। इसमें कुल 20 काण्ड है। अथर्ववेद में आठ खण्ड आते हैं जिनमें भेषज वेद एवं धातु वेद ये दो नाम स्पष्ट प्राप्त हैं।

Read more Granth-Hindu puran

वेदवाड्मय-परिचय एवं अपौरुषेयवाद

भारतीय संस्कृति एवं सनातन धर्म का मूल आधार है वेद। विश्व का सर्वप्रथम और अति प्राचीन वाड्मय ‘वेद’ माना गया है। मानव जाति के पारमार्थिक तथा लौकिक अभ्युदय-हेतु प्राकट्य होने से वेद को अनादि एवं नित्य कहा गया है। अति प्राचीनकालीन महा तपा, पुण्यपुञ्ज ऋषियों के पवित्रतम अन्त:करण में वेद के दर्शन हुए थे, अत: उसका ‘वेद’ नाम प्राप्त हुआ।
ब्रह्म का स्वरूप ‘सत-चित-आनन्द’ है। जिस कारण ब्रह्मा को वेद का पर्यायवाची शब्द कहां गया है।
इसी कारण वेद को लौकिक एवं अलौकिक ज्ञान का भंडार माना गया है।

‘तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये0’-
इसका मतलब यह है कि कल्प के शुरुआती समय में आदि कवि ब्रह्मा के ह्रदय मैं वेद प्रकट हुआ।

सुप्रसिद्ध वेदभाष्यकार महान पण्डित सायणाचार्य अपने वेदभाष्य में लिखते हैं-
इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो ग्रन्थो वेदयति स वेद:'[1]
निरूक्त कहता है कि ‘विदन्ति जानन्ति विद्यन्ते भवन्ति0’ [2]
‘आर्यविद्या-सुधाकर’ नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि— वेदो नाम वेद्यन्ते ज्ञाप्यन्ते धर्मार्थकाममोक्षा अनेनेति व्युत्पत्त्या चतुर्वर्गज्ञानसाधनभूतो ग्रन्थविशेष:॥ [3]
‘कामन्दकीय नीति’ भी कहती है- ‘आत्मानमन्विच्छ0।’ ‘यस्तं वेद स वेदवित्॥’ [4] कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मज्ञान का ही पर्याय वेद है।
तथापि मुण्डकोपनिषद की मान्यता है कि वेद चार हैं- ‘ऋग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदो ऽथर्ववेद:॥'[5]इन वेदों के चार उपवेद इस प्रकार हैं—
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्र्चेति ते त्रय:।
स्थापत्यवेदमपरमुपवेदश्र्चतुर्विध:॥

उपवेदों के कर्ताओं में

1.आयुर्वेद के कर्ता धन्वन्तरि,
2.धनुर्वेद के कर्ता विश्वामित्र,
3.गान्धर्ववेद के कर्ता नारद मुनि और
4.स्थापत्यवेद के कर्ता विश्वकर्मा हैं।

Janiye Shiv ki mahima-SHIV PURAN

Shiv puran in hindi-सम्पूर्ण शिव महापुराण हिंदी में

मनुस्मृति में वेद ही श्रुति

मनुस्मृति कहती है- ‘श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेय:'[6] ‘आदिसृष्टिमारभ्याद्यपर्यन्तं ब्रह्मादिभि: सर्वा: सत्यविद्या: श्रूयन्ते सा श्रुति:॥'[7] सत्पुरुषों को नमन। सत्पुरुषों ने जो ज्ञान प्राप्त किया और उसे जगत के कल्याण के लिए प्रकट भी किया, उस महा ज्ञान को श्रुति कहते हैं।

श्रुति को दो विभागों में बांटा गया है।

1.वैदिक और 2.तान्त्रिक

‘श्रुतिश्च द्विविधा वैदिकी तान्त्रिकी च।’

इनमें से तंत्र को तीन मुख्य हिस्सों में विभाजन किया गया।
1.महानिर्वाण-तन्त्र,
2.नारदपाञ्चरात्र-तन्त्र और
3.कुलार्णव-तन्त्र।

इसी तरह वेद के भी दो विभाग है-
1.मन्त्र विभाग
2.ब्राह्मण विभाग

1.मन्त्र विभाग

इस विवाह को संहिता भी कहते हैं। संहितापरक भाष्य को ‘ब्राह्मणग्रन्थ’ कहते हैं। संहितापरक विवेचन को ‘आरण्यक’
कहते हैं।

2.ब्राह्मण विभाग

‘आरण्यक’ और ‘उपनिषद’इन्हीं दो को मिलाकर ब्राह्मण विभाग बना है। ब्राह्मण ग्रंथों की कुल संख्या 13 है।जिसमें ऋग्वेद के दो,यजुर्वेद के दो,सामवेद के आठ, अथर्ववेद के एक का समावेश है।

अब हम देख लेते हैं मुख्य ब्राह्मण ग्रंथ

मुख्य ब्राह्मण ग्रंथ 5 है।
यह कुछ इस प्रकार है- 1.ऐतरेय ब्राह्मण,
2.तैत्तिरीय ब्राह्मण,
3.तलवकार ब्राह्मण,
4.शतपथ ब्राह्मण और
5.ताण्डय ब्राह्मण।

अब हम जान लेते उपनिषदों की संख्या कितनी है?

उपनिषदों की कुल संख्या तो 108 है परंतु मुख्य रूप से 12 माने गए हैं।

जिनमें 1.ईश,
2.केन,
3.कठ,
4.प्रश्न,
5.मुण्डक,
6.माण्डूक्य,
7.तैत्तिरीय,
8.ऐतरेय,
9.छान्दोग्य,
10.बृहदारण्यक,
11.कौषीतकि और
12.श्वेताश्वतर
समावेश है।

वेदों का इतिहास जानें

।।ॐ।।

‘विद’ शब्द से वेद बना हैजिसका अर्थ होता है ज्ञान(जानना ),ज्ञाता(जानने वाला)।सिर्फ जानने वाला, जानकर जाना-परखा ज्ञान। जाँचा-परखा मार्ग। इसी में संकलित है ‘ब्रह्म वाक्य’। मानव सभ्यता के सबसे पुराने लिखित दस्तावेज है वेद। भारत में पुणे के ‘भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट’मैं वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ रखी हुई है। यूनेस्को ने विरासत सूची में ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ को शामिल किया है।

यूनेस्को द्वारा सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में 30 पांडुलिपियों को शामिल किया गया है। यूनेस्को की 158 सूची में पांडुलिपियों की सूची 38 है।

वेद का दूसरा नाम क्या है ?

वेद को ‘श्रुति’ भी कहा जाता है।

वेद-सार

सबसे पुराने ग्रंथों में वेद की गिनती होती है। सृष्टि के शुरुआती समय में ईश्वर ने अपना ईश्वरीय ज्ञान चार ऋषियों को दिया था। अग्नि,आदित्य,वायु और अंगिरा यही वह चार ऋषि थे। इन्हीं के माध्यम से ईश्वर ने वेद को पृथ्वी पर भेजा। वेद चार हैं – ऋगवेद, यजुर्वेद ,सामवेद और अथर्व वेद .

Leave a Comment