Shiv puran in hindi-सम्पूर्ण शिव महापुराण हिंदी में

 Shiv puran in hindi-सम्पूर्ण शिव महापुराण 

Shiv puran in hindi-सम्पूर्ण शिव महापुराण
           SHIV PURAN

Shiv puran in hindi

1-भगवान शंकर के पूर्ण रूप काल भैरव

एक बार सुमेरु पर्वत पर बैठे हुए ब्रम्हाजी के पास जाकर देवताओं ने उनसे अविनाशी तत्व बताने का अनुरोध किया | शिवजी की माया से मोहित ब्रह्माजी उस तत्व को न जानते हुए भी इस प्रकार कहने लगे – मैं ही इस संसार को उत्पन्न करने वाला स्वयंभू, अजन्मा, एक मात्र ईश्वर , अनादी भक्ति, ब्रह्म घोर निरंजन आत्मा हूँ|

मैं ही प्रवृति उर निवृति का मूलाधार , सर्वलीन पूर्ण ब्रह्म हूँ | ब्रह्मा जी ऐसा की पर मुनि मंडली में विद्यमान विष्णु जी ने उन्हें समझाते हुए कहा की मेरी आज्ञा से तो तुम सृष्टी के रचियता बने हो, मेरा अनादर करके तुम अपने प्रभुत्व की बात कैसे कर रहे हो ?

इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु अपना-अपना प्रभुत्व स्थापित करने लगे और अपने पक्ष के समर्थन में शास्त्र वाक्य उद्घृत करने लगे| अंततः वेदों से पूछने का निर्णय हुआ तो स्वरुप धारण करके आये चारों वेदों ने क्रमशः अपना मत६ इस प्रकार प्रकट किया –

ऋग्वेद– जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं तथा जिससे सब कुछ प्रवत्त होता है और जिसे परमात्व कहा जाता है, वह एक रूद्र रूप ही है |

यजुर्वेद– जिसके द्वारा हम वेद भी प्रमाणित होते हैं तथा जो ईश्वर के संपूर्ण यज्ञों तथा योगों से भजन किया जाता है, सबका दृष्टा वह एक शिव ही हैं|

सामवेद– जो समस्त संसारी जनों को भरमाता है, जिसे योगी जन ढूँढ़ते हैं और जिसकी भांति से सारा संसार प्रकाशित होता है, वे एक त्र्यम्बक शिवजी ही हैं |

अथर्ववेद– जिसकी भक्ति से साक्षात्कार होता है और जो सब या सुख – दुःख अतीत अनादी ब्रम्ह हैं, वे केवल एक शंकर जी ही हैं|

 विष्णु ने वेदों के इस कथन को प्रताप बताते हुए नित्य शिवा से रमण करने वाले, दिगंबर पीतवर्ण धूलि धूसरित प्रेम नाथ, कुवेटा धारी, सर्वा वेष्टित, वृपन वाही, निःसंग,शिवजी को पर ब्रम्ह मानने से इनकार कर दिया| ब्रम्हा-विष्णु विवाद को सुनकर ओंकार ने शिवजी की ज्योति, नित्य और सनातन परब्रम्ह बताया परन्तु फिर भी शिव माया से मोहित ब्रम्हा विष्णु की बुद्धि नहीं बदली|| 

उस समय उन दोनों के मध्य आदि अंत रहित
एक ऐसी विशाल ज्योति प्रकट हुई की उससे

shiv puran
                                            काल भैरव

ब्रम्हा का पंचम सिर जलने लगा| इतने में
त्रिशूलधारी नील-लोहित शिव वहां प्रकट हुए तो
अज्ञानतावश ब्रम्हा उन्हें अपना पुत्र समझकर
अपनी शरण में आने को कहने लगे|
ब्रम्हा की संपूर्ण बातें सुनकर शिवजी अत्यंत
क्रुद्ध हुए और उन्होंने तत्काल भैरव को प्रकट
कर उससे ब्रम्हा पर शासन करने का आदेश
दिया| आज्ञा का पालन करते हुए भैरव ने अपनी
बायीं ऊँगली के नखान से ब्रम्हाजी का पंचम
सिर काट डाला| भयभीत ब्रम्हा शत रुद्री का
पाठ करते हुए शिवजी के शरण हुए| ब्रम्हा और
विष्णु दोनों को सत्य की प्रतीति हो गयी और वे
दोनों शिवजी की महिमा का गान करने लगे|
यह देखकर शिवजी शांत हुए और उन दोनों को
अभयदान दिया|
इसके उपरान्त शिवजी ने उसके भीषण होने के
कारण भैरव और काल को भी भयभीत करने
वाला होने के कारण काल भैरव तथा भक्तों
के पापों को तत्काल नष्ट करने वाला होने के
कारण पाप भक्षक नाम देकर उसे काशीपुरी का
अधिपति बना दिया | फिर कहा की भैरव तुम
इन ब्रम्हा विष्णु को मानते हुए ब्रम्हा के कपाल
को धारण करके इसी के आश्रय से भिक्षा वृति
करते हुए वाराणसी में चले जाओ | वहां उस
नगरी के प्रभाव से तुम ब्रम्ह हत्या के पाप से
मुक्त हो जाओगे |

शिवजी की आज्ञा से भैरव जी हाथ में कपाल
लेकर ज्योंही काशी की ओर चले, ब्रम्ह हत्या
उनके पीछे पीछे हो चली| विष्णु जी ने उनकी
स्तुति करते हुए उनसे अपने को उनकी माया से
मोहित न होने का वरदान माँगा | विष्णु जी ने
ब्रम्ह हत्या के भैरव जी के पीछा करने की माया
पूछना चाही तो ब्रम्ह हत्या ने बताया की वह तो
अपने आप को पवित्र और मुक्त होने के लिए
भैरव का अनुसरण कर रही है |
भैरव जी ज्यों ही काशी पहुंचे त्यों ही उनके हाथ
से चिमटा और कपाल छूटकर पृथ्वी पर गिर गया
और तब से उस स्थान का नाम कपालमोचन
तीर्थ पड़ गया | इस तीर्थ मैं जाकर सविधि
पिंडदान और देव-पितृ-तर्पण करने से मनुष्य
ब्रम्ह हत्या के पाप से निवृत हो जाता है

2-शिव का रूद्र रूप है वीरभद्र

यह अवतार तब हुआ था जब ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया लेकिन भगवान शिव को उसमें नहीं बुलाया। जबकि दक्ष की पुत्री सती का विवाह शिव से हुआ था। यज्ञ की बात ज्ञात होने पर सती ने भी वहां चलने को कहा लेकिन शिव ने बिना आमंत्रण के जाने से मना कर दिया। फिर भी सती जिद कर अकेली ही वहां चली गई। अपने पिता के घर जब उन्होंने शिव का और स्वयं का अपमान अनुभव किया तो उन्हें क्रोध भी हुआ और उन्होंने यज्ञवेदी में कूदकर अपनी देह त्याग दी। जब भगवान शिव को यह पता हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए।

शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है-

क्रुद्ध: सुदष्टष्ठपुट: स धूर्जटिर्जटां तडिद्व ह्लिस टोग्ररोचिषम्।

उत्कृत्य रुद्र: सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥

ततोऽतिकाय स्तनुवा स्पृशन्दिवं। – श्रीमद् भागवत -4/5/1

अर्थात सती के प्राण त्यागने से दु:खी भगवान शिव ने उग्र रूप धारण कर क्रोध में अपने होंठ चबाते हुए अपनी एक जटा उखाड़ ली, जो बिजली और आग की लपट के समान दीप्त हो रही थी। सहसा खड़े होकर उन्होंने गंभीर अठ्ठाहस के साथ जटा को पृथ्वी पर पटक दिया। इसी से महाभयंकर वीरभद्र प्रगट हुए।

भगवान शिव के वीरभद्र अवतार का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। यह अवतार हमें संदेश देता है कि शक्ति का प्रयोग वहीं करें जहां उसका सदुपयोग हो। वीरों के दो वर्ग होते हैं- भद्र एवं अभद्र वीर।

राम, अर्जुन और भीम वीर थे। रावण, दुर्योधन और कर्ण भी वीर थे लेकिन पहला भद्र (सभ्य) वीर वर्ग और दूसरा अभद्र (असभ्य) वीर वर्ग है। सभ्य वीरों का काम होता है हमेशा धर्म के पथ पर चलना तथा नि:सहायों की सहायता करना। वहीं असभ्य वीर वर्ग सदैव अधर्म के मार्ग पर

 

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