Samveda in hindi || सामवेद – सामवेद मंत्र, संहिता, पाठ

Samveda in hindi || सामवेद – सामवेद मंत्र, संहिता, पाठ

Ved ke prakar mei ek aur prakar hai samveda . Aaj ka iss article se hum apke sabhi prakar ke prashno ka vistar swaroop utttar dena ka pariyatna karge. Kripa iss article Samveda in hindi || सामवेद – सामवेद मंत्र, संहिता, पाठ ko pura padhe aur hume apne vichar comments mei suchit kare. Hindiforu.in mei apka swagat hai bandhugun.

Samveda kya hai – सामवेद

साम’ शब्द का अर्थ है ‘गान‘। सामवेद में संकलित मंत्रों को देवताओं की स्तुति के समय गाया जाता था। सामवेद में कुल 1875 ऋचायें हैं। जिनमें 75 से अतिरिक्त शेष ऋग्वेद से ली गयी हैं। इन ऋचाओं का गान सोमयज्ञ के समय ‘उदगाता’ करते थे।

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सामदेव की तीन महत्त्वपूर्ण शाखायें हैं- Samveda ke teen prakar
1.कौथुमीय,
2.जैमिनीय एवं
3.राणायनीय।

देवता विषयक विवेचन की दृष्ठि से सामवेद का प्रमुख देवता ‘सविता’ या ‘सूर्य’ है, इसमें मुख्यतः सूर्य की स्तुति के मंत्र हैं किन्तु इंद्र सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन है। भारतीय संगीत के इतिहास के क्षेत्र में सामवेद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है। सामवेद का प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनि को माना जाता है।

सामवेद से तात्पर्य है कि वह ग्रन्थ जिसके मन्त्र गाये जा सकते हैं और जो संगीतमय हों। यज्ञ, अनुष्ठान और हवन के समय ये मन्त्र गाये जाते हैं। सामवेद में मूल रूप से 99 मन्त्र हैं और शेष ऋग्वेद से लिये गये हैं।
इसमें यज्ञानुष्ठान के उद्गातृवर्ग के उपयोगी मन्त्रों का संकलन है। इसका नाम सामवेद इसलिये पड़ा है कि इसमें गायन-पद्धति के निश्चित मन्त्र ही हैं। इसके अधिकांश मन्त्र ऋग्वेद में उपलब्ध होते हैं, कुछ मन्त्र स्वतन्त्र भी हैं।
सामवेद में ऋग्वेद की कुछ ॠचाएं आकलित है।
वेद के उद्गाता, गायन करने वाले जो कि सामग (साम गान करने वाले) कहलाते थे। उन्होंने वेदगान में केवल तीन स्वरों के प्रयोग का उल्लेख किया है जो उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित कहलाते हैं।
सामगान व्यावहारिक संगीत था। उसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं हैं।
वैदिक काल में बहुविध वाद्य यंत्रों का उल्लेख मिलता है जिनमें से

1.तंतु वाद्यों में कन्नड़ वीणा, कर्करी और वीणा,
2.घन वाद्य यंत्र के अंतर्गत दुंदुभि, आडंबर,
3.वनस्पति तथा सुषिर यंत्र के अंतर्गतः तुरभ, नादी तथा
4.बंकुरा आदि यंत्र विशेष उल्लेखनीय हैं।

सामवेद से पाठ – अच्छा काम करने के लिये सत्य ही शस्त्र

अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार बिना बेईमानी के कोई भी धनी नहीं हो सकता। हमारे देश में अंग्रेजी राज व्यवस्था, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा संस्कारों ने जड़ तक अपनी स्थापना कर ली है जिसमे छद्म रूप की प्रधानता है।

इसलिये अब यहां भी कहा जाने लगा है कि सत्य, ईमानदारी, तथा कर्तव्यनिष्ठा से कोई काम नहीं बन सकता। दरअसल हमारे यहां समाज कल्याण अब राज्य की विषय वस्तु बन गया है इसलिये धनिक लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया है। लोकतंत्र में राजपुरुष के लिये यह अनिवार्य है कि वह लोगों में अपनी छवि बनाये रखें इसलिये वह समाज में अपने आपको एक सेवक के रूप में प्रस्तुत कर कल्याण के ने नारे लगाते हैं। वह राज्य से प्रजा को सुख दिलाने का सपना दिखाते हैं। योजनायें बनती हैं, पैसा व्यय होता है पर नतीजा फिर भी वही ढाक के तीन पात रहता है।

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इसके अलावा गरीब, बेसहारा, बुजुर्ग, तथा बीमारों के लिये भारी व्यय होता है जिसके लिये बजट में राशि जुटाने के लिये तमाम तरह के कर लगाये गये हैं। इन करों से बचने के लिये धनिक राज्य व्यवस्था में अपने ही लोग स्थापित कर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ात जाते हैं । उनका पूरा समय धन संग्रह और उसकी रक्षा करना हो गया है इसलिये धर्म और दान उनके लिये महत्वहीन हो गया है।

सामवेद में कहा गया है कि – सामवेद मंत्र || Samveda mantra

Samveda in hindi mantra Read ⇓⇓

ऋतावृधो ऋतस्पृशौ बहृन्तं क्रतुं ऋतेन आशाये।
”सत्य प्रसारक तथा सत्य को स्पर्श करने वाला कोई भी महान कार्य सत्य से ही करते हैं। सत्य सुकर्म करने वाला शस्त्र है।”
”वार्च वर्थय।
”सत्य वचनों का विस्तार करना चाहिए।”
वाचस्पतिर्मरवस्यत विश्वस्येशान ओजसः।
”विद्वान तेज हो तो पूज्य होता है।”
कहने का अभिप्राय है कि हमारे देश में सत्य की बजाय भ्रम और नारों के सहारे ही आर्थिक, राजकीय तथा सामाजिक व्यवस्था चल रही है। राज्य ही समाज का भला करेगा यह असत्य है।

एक मनुष्य का भला दूसरे मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयास से ही होना संभव है पर लोकतांत्रिक प्रणाली में राज्य शब्द निराकार शब्द बन गया है। करते लोग हैं पर कहा जाता है कि राज्य कर रहा है। अच्छा करे तो लोग श्रेय लेेते हैं और बुरा हो तो राज्य के खाते में डाल देते हैं। इस एक तरह से छद्म रूप से ही हम अपने कल्याण की अपेक्षा करते हैं जो कि अप्रकट है।

भारतीय अध्यात्म ज्ञान से समाज के परे होने के साथ ही विद्वानों का राजकीयकरण हो गया है। ऐसे में असत्य और कल्पित रचनाकारों को राजकीय सम्मान मिलता है और समाज की स्थिति यह है कि सत्य बोलने विद्वानों से पहले लोकप्रियता का प्रमाणपत्र मांगा जाता है। हम इस समय समाज की दुर्दशा देख रहे हैं वह असत्य मार्ग पर चलने के कारण ही है।
सत्य एक ऐसा शस्त्र है जिससे सुकर्म किये जा सकते हैं। जिन लोगों को असत्य मार्ग सहज लगता है उन्हें यह समझाना मुश्किल है पर तत्व ज्ञानी जाते हैं कि क्षणिक सम्मान से कुछ नहीं होता इसलिये वह सत्य के प्रचार में लगे रहते है और कालांतर में इतिहास उनको अपने पृष्ठों में उनका नाम समेट लेता है।

सामवेद से संदेश-उषाकाल में जागना स्वास्थ्यवर्द्धक

सामवेद में कहा गया है कि
उस्त्रा देव वसूनां कर्तस्य दिव्यवसः।
”उषा वह देवता है जिससे रक्षा के तरीके सीखे जा सकते हैं।”
ते चित्यन्तः पर्वणापर्वणा वयम्।
”हम प्रत्येक पर्व में तेरा चिंत्न करें”

प्रातः उठने से न केवल विकार दूर होते हैं वरन् जीवन में कर्म करने के प्रति उत्साह भी पैदा होता है। अगर हम आत्ममंथन करें तो पायेंगे कि हमारे अंदर शारीरिक और मानसिक विकारों का सबसे बड़ा कारण ही सूर्योदय के बाद नींद से उठना है। हमारी समस्या यह नही है कि हमें कहीं सही इलाज नहीं मिलता बल्कि सच बात यह है कि अपने अंदर विकारों के आगमन का द्वार हम सुबह देरसे उठकर स्वयं ही खोलते हैं। बेहतर है कि हम सुबह सैर करें या योगसाधना करें। व्यायाम करना भी बहुत अच्छा है।

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