प्रेरणादायक हिंदी कहानियां-Prernadayak kahaniya in hindi

प्रेरणादायक हिंदी कहानियां-Prernadayak kahaniya in hindi

प्रेरणादायक हिंदी कहानियां yeh kahani ke sangrah mei hum apke liye laye hai 3 vishes kahaniya jo apko prerna degi.Chaliya apka swagat hai प्रेरणादायक हिंदी कहानियां mei sirf hindiforu.in

 Prernadayak kahaniya No-1 

एक व्यक्ति के बारे में यह विख्यात था कि उसे कभी क्रोध नहीं आता। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें बुरी बातें ही सूझती है। ऐसे ही व्यक्तियों में से एक ने निश्चय किया कि उस अक्रोधी इंसान को गुस्सा दिलाया जाए और वह व्यक्ति इस काम में लग गया। उसने ऐसे व्यक्तियों की एक टोली बना ली और उस सज्जन के नौकर से कहा यदि तुम अपने स्वामी को क्रोध दिला सको तो तुम्हें पुरस्कार दिया जाएगा। नौकर उन सब की बातों पर तैयार हो गया। नौकर जानता था कि उसके मालिक को सिकुड़ा हुआ बिस्तर बिल्कुल पसंद नहीं। अतः उसने उस दिन बिस्तर को ठीक ही नहीं किया।

प्रात काल होने पर सज्जन ने नौकर से सिर्फ इतना कहा कि कल बिस्तर ठीक था?
इस पर नौकर बहाना बनाते हुए बोला कि मैं भूल गया था।
नौकर ने यही चीज दूसरे,तीसरे,चौथे दिन भी दौराई।

तब उस सज्जन ने नौकर से कहां लगता है तुम बिस्तर करना भूल चुके हो।या चाहते हो कि मैं इस बिस्तर पर ही सोऊ।कोई बात नहीं अब मैं इसी बिस्तर पर सोऊंगा। अब तो मुझे भी इसी बिस्तर की आदत हो गई है।

ऐसा सुनते ही नौकर आश्चर्यचकित हो क्या और अपने मालिक के चरणों पर गिर कर रोने लगा।

हमेशा सभी से नम्र ढंग से बात करें।चाहे वह व्यक्ति आपके लिए कोई भी काम क्यों ना करता हूं
…………

 Prernadayak kahaniya No-2 

आचार्य द्रोणाचार्य जब राजकुमारों को धनुष विद्या की शिक्षा देने लगे। अर्जुन सभी राजकुमारों में से द्रोणाचार्य के प्रिय थे। वे गुरु भक्त एवं प्रतिभा वान थे।द्रोणाचार्य का अपने पुत्र अश्वत्थामा पर भी बहुत ध्यान रहता था। परंतु प्रतिभा में अर्जुन से बढ़कर कोई नहीं अश्वत्थामा भी नहीं थे। एक रात्रि गुरु के आश्रम में जब सभी शिष्य भोजन कर रहे थे तब अकस्मात हवे के चलने से दिया बुझ गया। अर्जुन ने देखा कि अंधकार होने पर भी हाथ भोजन का निवाला बराबर मुंह में ले जा रहा था। इस घटना से अर्जुन समझ गए निशाना लगाने के लिए प्रकाश कि नहीं अभ्यास की जरूरत है। अर्जुन ने तत्काल प्रतिदिन रात के अंधकार में निशाना लगाने का अभ्यास आरंभ कर दिया। गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन के इस अभ्यास से प्रसन्न हुए। उन्होंने अर्जुन को इसके साथ ही तलवार,तोमर आदि शास्त्रों के प्रयोग में माहिर बना दिया।

उन्हीं दिनों हिरणय धनु के पुत्र एकलव्य भी धनुर्विद्या सीखने के लिए द्रोणाचार्य के आश्रम आए। परंतु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को अपना शिष्य बनाने से इनकार कर दिया।

निराशा से भरे एकलव्य वन में चले गए और उन्होंने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई। उस मूर्ति को वह अपना गुरु मानकर धनुर्विद्या सीखना उन्होंने शुरु कर दिया।धीरे धीरे स्वयं सीखते सीखते हुए धनुर्विद्या में माहिर हो गए। एक दिन सारे शिष्य और गुरु द्रोणाचार्य जब जंगल की सैर के लिए निकले। तब उनके साथ उनका एक कुत्ता भी उनकी ओर चल पड़ा। परंतु सटीक रास्ते पर ना चलने से कुत्ता एकलव्य के कुटिया जा पहुंचा। कुत्ते के जोर जोर से भोकने की आवाज से। एकलव्य ने उसके नाक पर ऐसा बाण चलाया कि वह कुत्ता ना आहत हुआ ना उसे कोई चोट आई। परंतु कुत्ते ने भोकना बंद कर दिया। जब कुत्ता वापस आया तो द्रोणाचार्य और उनके शिष्य यह देखकर हैरान थे कि इतना निपुण किस ने इस पर बाण चलाया।

गुरु द्रोणाचार्य उस कुटी की ओर गयेऔर उन्होंने एक धनुर्धारी पाया। पूछने पर एकलव्य ने उन्हें सारी बात विस्तार से बताइ। अर्जुन जितना निपुण धनुर्धारी होने के कारण। गुरु दक्षिणा में द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा मांग लिया।
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 Prernadayak kahaniya No-3 

4 सवाल

एक बार की बात है एक राजा ने अपने मंत्री से सवाल किया मुझे इन 4 सवाल का तुम जवाब दो।
1. जो यहां है वहां नहीं?
2. वहां हो यहां नहीं?
3. जो यहां भी ना हो वहां भी ना हो?
4. जो यहां भी हो और वहां भी हो?
मंत्री ने राजा से कहा महाराज मैं अभी इस समय आपके इस उत्तर का जवाब नहीं दे पाऊंगा मुझे 2 दिन का समय दिया जाए। महाराज ने हंसते हुए कहा जरूर जरूर जितना समय चाहिए उतना समय लो।
दो दिन के अंतराल के बाद मंत्री ने दरबार में चार व्यक्तियों को हाजिर किया। मंत्री कहने लगे-महाराज हमारे प्राचीन ग्रंथों में यह उल्लेख किया है कि इंसान अपने कर्म के अनुसार स्वर्ग या नरक पाता है।
आज मैं इसीलिए आपके समक्ष चार व्यक्तियों को लाया हूं।
महाराज यह पहला आदमी -एक भ्रष्टाचारी नेता है।
यह यहां तो सब सुख भोग लेगा परंतु परंतु इसके बुरे कामों के कारण इसे वहां जगह नहीं मिलेगी। यह हुआ आपके पहले प्रश्न का उत्तर जो यहां है वहां नहीं?

महाराज यह है दूसरा व्यक्ति यह सद्गृहस्ती है।यह व्यक्ति यहां बड़ी ईमानदारी और निष्ठा से रहता है इसीलिए इसकी जगह यहां भी है और वहां भी होगी।

महाराज यह तीसरा व्यक्ति-यह एक भीकारी है।यह पराक्षित है। यह ना यहां खुश है ना वहां खुश रहेगा।

महाराज यह चौथा व्यक्ति-यह एक ईमानदार दयालु आदमी।
इसने अपने दरियादिली और दयालु पन से बहुत से लोगों की मदद की है।
इसके अच्छे कामों के कारण यह यहां भी सुखी है और वहां भी सुखी होगा।

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