Explain seven golden principle for effective game design-7 गोल्डन प्रिंसिपल क्या है इफेक्टिव गेम डिजाइन के

 इस आर्टिकल में हम विस्तार से जानेंगे की गेम डिजाइन के वह कौन से 7 गोल्डन प्रिंसिपल से जो यूज किए जाते हैं।

नीचे दिए गए 7 गोल्डन प्रिंसिपल है गेम डिजाइन के:

1.Reuse लिए प्लेन करना/Plan for reuse. 
2.टीम मेंबर के साथ डॉक्यूमेंट तथा इंफॉर्मेशन शेयर करना/Document,share information with team member. 
3.डेवलपमेंट के पहले डिजाइन करना/Design before development. 
4.अपने शेड्यूल पर stick रहना/stick to schedule. 
5.Early स्टेज में fix करना error/Fix error early. 
6.R तथा D की डिग्री कंट्रोल करना/Control the degree of R and D. 
7.Right area पर फोकस करना Right अमाउंट आफ टाइम के लिए/Focus the right areas for the right amount of time.

इन सभी सातों प्रिंसिपल का विश्लेषण निम्नलिखित है।

1.रीयूज/Reuse

गेम डेवलपमेंट मे reuse का मतलब यह नहीं होता है कि सिर्फ code को resuse किया जाए।

सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर जो पालन करता है non-functional रिक्वायरमेंट,वह भी री यूज़ किए जाते हैं।

Reusable कंपोनेंट जो आधारित होता है उसके फंक्शनैलिटी के ऊपर, उसे architecturally compatible होना पड़ता है उसी के respective एप्लीकेशंस के लिए।

विभिन्न प्रकार के artifact जो compitable हैं आर्किटेक्चर के साथ वह भी यूज किए जा सकते हैं।

जो सबसे कॉमन reused क्लास है game प्रोजेक्ट में वह है फाउंडेशन क्लासेस।

सभी reusable कंपोनेंट यूज करते है स्टैंडर्ड आर्किटेक्चर, जिसे जानकारी होती है इनपुट तथा आउटपुट फॉर्मेट की।

 

2.डॉक्यूमेंटेशन

डॉक्यूमेंटेशन यह बेहद इंपॉर्टेंट है सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के सक्सेस के लिए

डॉक्यूमेंटेशन यह एक इंटीग्रल पार्ट है गेम कंस्ट्रक्शन का।

गेम प्रोग्रामर डिजाइनर जनरेट करते हैं सभी डाक्यूमेंट्स जो असोसिएट ऐड है game के साथ।

एक डिफेक्टिव डॉक्यूमेंटेशन वही होता है जिसमें प्रोग्रामर तथा गेम coderके पास क्लियर आइडिया हो जो बाद में रेफर किया जा सके गेम डिजाइनिंग के समय।

गेम डॉक्यूमेंट इसे रेफर किया जाता है एक tool की तरह ताकि गेम डिजाइन टीम में जो मेंबर हो उनके बीच में कोई इंटरप्शन ना हो एक दूसरे के बीच में काम के समय।

3.डिजाइन करें डॉक्यूमेंटेशन से पहले

डिजाइनिंग एक ओंगोइंग प्रोसेस है
यह स्टार्ट होता है एक आईडिया से इससे एक विजन तैयार होता है जो develop करता है कंसेप्ट को जो इनिशियल डेवलपमेंट में।

डिजाइनर को फोकस करना पड़ता है गेम प्ले के ऊपर तथा डिजाइन करना पड़ता है रूल्स को इसके साथ ही स्ट्रक्चर जो प्लेयर को गेम खेलते समय एंट्रेंस दें।

जो एलिमेंट मिसिंग है उसे प्रोटोटाइपिंग द्वारा प्राप्त किया जाता है तथा यह प्रोडक्शन रिस्क को काफी कम कर देता है।
इसी कारणवश गेम की डिजाइनिंग सर्वप्रथम आता है तथा इसके बाद इंप्लीमेंटेशन किया जाता है।

4.टास्को शेड्यूल करना

एक ही शेडूल पर चिपके रहना यह काफी इंपॉर्टेंट है।
परंतु यह हमेशा पॉसिबल नहीं है कि एक ही शेड्यूल को हम यूज करें तथा और अन्य कारणों से शेडूल को बदला जाता है जैसे-जैसे डेवलपमेंट आगे बढ़ता है
हर एक टास्क के लिए उसकी शुरुआती डेट उसकी अंतिम डेट उसके डिपेंडेंसी तथा resource की एलोकेशन डिसाइड की जाती है।

टास्क शेड्यूलर सीट से हमें प्रोजेक्ट का टोटल ड्यूरेशन मिल सकता है तथा उससे हम रीकैलकुलेट भी कर सकते हैं।

 

5.जल्दी एरर फिक्स करें

error की रिपेयरिंग की कॉस्ट manifold होती है, यदि लेट प्राप्त हो तो उसे जल्द फिक्स्ड किया जाता है।
सर्वप्रथम पहला एरर फिक्स करें तथा चेंज करें और उसे कंपाइल और रन करें।

फाइल को सेव करें जैसे ही एरर फिक्स हो जाए तथा इसके साथ ही कंपाइल करें और रन करें ।

टेस्टिंग यह स्टार्ट कर देनी चाहिए प्री प्रोडक्शन स्टेज में ही

टेस्टिंग यह सर्वप्रथम डेवलपर्स द्वारा करना चाहिए प्रोडक्शन स्टेज में डिलीवरी के पहले।

6.R तथा D कि डिग्री कंट्रोल करना

गेम डेवलपर कंट्रोल करता है रिसर्च के डिग्री को लेटेस्ट टेक्नोलॉजी इसके माध्यम से तथाअसिस्टेंस लेकर।

यह हमेशा रिकमेंट किया जाता है कि एक बैकअप प्लान रखें जब भी कोई न्यू टेक्नोलॉजी को हम यूज करें।
फोकस किया जाए राइट एरिया,राइट टाइम के लिए।

गेम डेवलपमेंट टीम में नॉलेज होना चाहिए गेम world के ऊपर, लेवल डिजाइन तथा के मेकैनिज्म तथा इसके साथ ही गेम को और कैसे इंटरेस्टिंग बनाया जाए इस पर भी ध्यान रखा जाता है

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