दादी मां की कहानियां-Dadi maa ki kahaniyan

दादी मां की कहानियां-Dadi maa ki kahaniyan

दादी मां की कहानियों के संग्रह मे आपका स्वागत है,दादी मां की कहानियां बहुत प्रचलित होने के साथ-साथ बालक पन में हमें मनोरंजक भी करती है, कुछ हंसी दिलाने वाली कहानी, तो कुछ सीख देने वाली कहानी। आज हम दादी मां की कहानियों का संपूर्ण भंडार आपके लिए लाए हैं। सभी कहानियों का आनंद लें और संपूर्ण कहानी पढ़ने के बाद हमें जरूर सूचित करें कि आपको कहानी कैसे लगी। Hindiforu

Dadi maa ki kahaniyan/ दादी मां की कहानियां

1. Dadi maa ki kahaniyan-चालाक बिल्ली

    दादी मां की कहानियां में प्रथम कहानी है चालाक बिल्ली की।

                 बहुत समय पहले की बात है। घने जंगल में एक बहुत बड़ा पेड़ था। उस पेड़ की शाखा पर एक चिड़िया और कौवा रहा करते थे। चिड़िया का घोंसला कौवा के घोसले से अलग था। दोनों दिन भर खाने की तलाश में भटकते, फिर वापस अपने अपने घोसले में आकर आराम करते। दिन यूं ही गुजर रहे थे कि एक दिन चिड़िया ने कौवे से कहा,“ पास के गांव में बहुत सारी फसल पक गई है, मैं उस फसल को चट कर आता हूं, तब तक तुम मेरे घोसले का ध्यान रखना।

          कौवे ने घोसले का ध्यान रखने का चिड़िया से वादा किया। कौवे की बात सुनकर चिड़िया खुश हुई और फुर्र से उड़ गई। शाम को कौवा चिड़िया की राह देखने लगा पर चिड़िया नहीं आई, धीरे-धीरे कई दिन बीत गए पर चिड़िया वापस नहीं आई। कौवे ने सोचा कि जरूर किसी ने उसे पकड़ लिया होगा।कौवे को अब विश्वास हो गया कि चिड़िया अब वापस नहीं आएगी।एक दिन एक सफेद रंग का खरगोश वहां से गुजर रहा था उसकी नजर में एक घोंसला आया। जैसे ही खरगोश अंदर आया। खरगोश को वह घर बहुत पसंद आया और वह उसी घर में रहने लगा।

       कौवे को खरगोश के रहने पर कोई एतराज नहीं था।बहुत दिन होने के बाद फसल खत्म हो गई और चिड़िया अपने घोसले में वापस आ गई। वापस आकर चिड़िया ने देखा कि उसके घर में एक खरगोश रह रहा है। चिड़िया ने तुरंत खरगोश से कहा यह घर तो मेरा है। इस पर खरगोश बोल पड़ा कि यह घर तुम्हारा कैसे इस पर तो मैं रह रहा हूं।इसीलिए यह घर मेरा है। चिड़िया नहीं मान रही थी और खरगोश भी नहीं मान रहा था। यह सब देखते हुए खरगोश ने कहा हम किसी बुद्धिमान से फैसला करवाते हैं।जैसा फैसला होगा दोनों को मानना पड़ेगा।एक रहेगा और एक चले जाएगा।

इन दोनों की लड़ाई एक बिल्ली चुप चाप देख रही थी। बिल्ली जोर-जोर से माला हाथ में लेकर राम-राम चिल्लाने लगी। उसकी आवाज सुनकर खरगोश की नजर उस बिल्ली पर पड़ी। खरगोश ने चिड़िया से कहा कि चलो क्यों ना बिल्ली से ही फैसला कराया जाए। चिड़िया ने तुरंत कहा यह हमारी पुरानी दुश्मन है इसलिए इस से दूरी बना कर रखना ही अच्छा होगा। चिड़िया ने दूर से आवाज देकर कहा,“ बिल्ली महाराज क्या तुम हमारा फैसला कर सकते हो। ”
बिल्ली ने आँख खोलकर कान बंद किया।

बिल्ली ने कहा मुझे तुम्हारी कोई भी बात सुनाई नहीं दे रही है। चिड़िया ने जोर से आवाज लगाई और कहा हमारा एक फैसला कर दीजिए। यह घर जिसका होगा वह यहां रहेगा और जो बच जाएगा उसे आप खा लेना। बिल्ली ने यह सुनकर नाटक करते हुए कहा, छि छि मैं शिकार करना छोड़ चुका हूं।

इस पर खरगोश को बिल्ली की बातों पर विश्वास हो गया और वह उसके पास जाकर सारी दास्तां बताने लगी। साथी खरगोश को बताता देख चिड़िया भी वहां तत्काल पहुंच गई। दोनों को पास में देख बिल्ली ने तुरंत झपट्टा मारकर दोनों को पकड़ लिया। इस तरह बिल्ली ने खरगोश को भी खा लिया और चिड़िया को भी खा लिया। पेट भर जाने के बाद बिल्ली खुद उस घोसले में रहने लग गई।
दादी मां की इस पहली कहानी में हमें यह सीखने मिला है कि कभी भी अपने दुश्मन पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

 

2. Dadi maa ki kahaniyan-लोमड़ी और सारस

  दादी मां की कहानियां में दूसरी कहानी है लोमड़ी और सारस की।

दादी नानी कहती थी बहुत समय पहले एक जंगल में बहुत चतुर लोमड़ी रहती थी। उसे दूसरों को मूर्ख बनाने में बहुत आनंद मिलता था।उस लोमड़ी की मित्रता एक सारस से थी। मगर लोमड़ी का दोस्त होने पर भी सारस बड़ा सादा सरल था। एक दिन लोमड़ी ने सोचा क्यों ना सारस का भी मजाक उड़ाया जाए।यही सोचकर लोमड़ी सारस के पास पहुंची और उससे खाने का न्योता दी। सारस लोमड़ी से नेवता पाकर बड़ा खुश हुआ।उसने लोमड़ी का शुक्रिया अदा किया और कहा कि मैं अवश्य आऊंगा।

निश्चित दिन सारस लोमड़ी के घर पहुंचा। जब भोजन का समय हुआ तो,जैसे योजना बनी हुई थी। लोमड़ी ने सूपप्लेट में परोसा। लोमड़ी के लिए प्लेट में सूप पीना काफी सरल था, मगर बेचारा सारस अपनी चोंच का आखरी सिरा ही सूप में भीगा पाया। भला वह अपनी चोच से कैसे सूप पिता। वह भूखा रह गया। सारस खुद को बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। वह समझ गया कि लोमड़ी ने उसका मजाक उड़ाने के लिए उसे दावत पर बुलाया है।

इधर लोमड़ी ने सारस की तरफ इशारा कर पूछा कि, कैसा लगा खाना?सारस ने लोमड़ी को धन्यवाद कहा और किसी दिन मेरे इधर भोजनके लिए आओ ऐसा लोमड़ी को न्योता दिया।सारस ने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि वह इस अपमान का बदला जरूर लेगा।

दूसरे ही दिन लोमड़ी सारस के यहां पहुंच गई। लोमड़ी आते ही बोल पड़ी आज मैं जमके खाऊंगी। सारस ने भी भोजन में शुभ बनाया था। उसने सूप लंबी गर्दन वाले बर्तन में परोसा।सारस ने बड़े आसानी से अपनी चोंच डालकर इस लंबी गर्दन वाले बर्तन से सुप को पीलिया। परंतु लोमड़ी दुविधा में पड़ गई और चारों ओर घूमने लगी। काफी कोशिश के बाद भी लोमड़ी को सुप का आनंद ना मिल पाया। वह भी उस दिन भूखे पेट रहे गई जैसे पहले दिन सारस था।इस तरह सारस ने लोमड़ी से अपने अपमान का बदला लिया।

3. Dadi maa ki kahaniyan-सोने के अंडे देने वाली मुर्गी

नमस्कार दादी मां की कहानी के तीसरी कहानी में आपका स्वागत है इस कहानी में दादी नानी ने लालच के प्रति ना पढ़ने की सीख देते हुए कहानी बताई है

दादी नानी की कहानी शुरू करते हैं। दादी कहती है बहुत समय पहले की बात है,एक दंपत्ति के पास एक अद्भुत मुर्गी थी। वह अद्भुत इसलिए थी क्योंकि वह सोने के अंडे देती थी। ऐसी जादुई मुर्गी जो अंडे देती हो शायद ही किसी भाग्यवान को मिला हो? वह दंपत्ति बहुत खुश थे। मुर्गी रोज एक अंडा देती और वह दंपत्ति वह अंडा बेच आते।

अंडा बेच बेच कर उन्होंने बहुत सारा धन इकट्ठा कर लिया था। एक दिन उनके मन में एक विचार आया कि यह मुर्गी प्रतिदिन एक अंडा देती है। इसका मतलब यह हुआ कि इसके पेट में बहुत सारे अंडे होगे। अगर सभी अंडे एक साथ मिल जाए तो हम इस शहर के सबसे अमीर व्यक्ति होंगे। मगर सारा अंडा एक साथ मिले तो मिले कैसे? ऐसा विचार उनके मन में आया।अचानक दोनों ने एक योजना बनाई। योजना के तहत दूसरे दिन दोनों ने मिलकर मुर्गी के पेट को काट दिया।

दोनों मुर्गी के पेट के भीतर सोने के अंडे ढूंढने लगे। वह दोनों ढूंढ ढूंढ के परेशान हो गए,पर उन्हें एक भी अंडा नहीं मिला। मिलता भी कैसे? मुर्गी के पेट के अंदर कोई अंडा था ही नहीं। उन बेवकूफो ने मुर्गी को मार कर प्रतिदिन मिलने वाला एक सोने का अंडा भी गवा दिया। मुर्गी का पेट चीरा जाने के कारण वह मर गई।

इसके बाद ना उन्हें सोने का अंडा मिला और ना वह दोनों ज्यादा धनवान बन पाए।दोनों के दिमाग पर लालच हावी होने के कारण उनकी आज यह दुर्दशा हुई। दादी मां बचपन में हमें ऐसी ही कहानी सुना सुना कर हमें हंसाती थी परंतु जब हम बड़े हो गए, तो आज हमें यह सब कहानियों का मतबल समझ आता है। जिंदगी में कभी भी लालच नहीं करना ना ही किसी से कुछ छीना की कोशिश करना दादी की कहानी से आज हमें यही सीख मिलती है।

4. Dadi maa ki kahaniyan-दयालु रानी

दादी मां की चौथी कहानी दयालु रानी

दादी मां कहती है अपनी कहानी में की जंगल में एक पेड़ हुआ करता था। उस पेड़ पर सुनहरी चिड़िया रहती थी। जब वह चिड़िया गाती तो उसकी चोंच से सोने के मोती झड़ते। एक दिन एक चिड़ीमार वही रस्ते गुजर रहा था। अचानक उसकी नजर उस चिड़िया पर गई।चिड़िया के मुंह से सोने के मोती झड़ते देख चिड़ीमार बहुत खुश हुआ।

चिड़ीमार मन ही मन सोचने लगा कि अब इसके सहारे मैं शहर का सबसे अमीर व्यक्ति बन जाऊंगा। उसके मन में यह सब ख्याल आते ही उसने जमीन पर जाल फैलाया और कुछ चावल के दाने उसमें फेंक दिए। सुनहरी चिड़िया जैसे ही दाने चुगने नीचे आई,वह जाल में फस गई। चिड़ीमार उसे पकड़ कर घर ले गया।उस दिन से चिड़ीमार के पास सोने के मोतियों के भंडार भर गए।देखते ही देखते चिड़ीमार धनवान आदमी बन गया। अब चिड़ीमार के पास धन की तो कमी नहीं थी परंतु सम्मान की बहुत कमी थी।

वह परेशान रहता था कि सब उसे चिड़ीमार चिड़ीमार ही बुलाते हैं। उसने सोचा कि मैं ऐसा क्या करूं कि लोग मुझे इज्जत दे। एक दिन उसके दिमाग में विचार आया और उसने उस चिड़िया के लिए सोने का पिंजरा बनाया। पिंजरा सहित चिड़िया उसने राजा को भेंट कर दिया। राजा भेंट देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने चिड़ीमार को अपने दरबार में एक पद दे दी।

जल्दी ही राजा के पास भी ढेरों सोने के मोती जमा हो गए। राजा ने प्रेम पूर्वक पिंजरा सहित चिड़िया रानी को भेंट कर दिया। रानी ने चिड़िया को देखकर पहला काम यह किया कि उसे आजाद कर दिया। आजाद होकर चिड़िया बहुत खुश हुई। उसने रानी को शुक्रिया कहा और वहां से उड़ चली। अब वह रोज रानी की ही गुणगान करती है।

5. Dadi maa ki kahaniyan-लालची कुत्ता

दादी मां की पांचवी कहानी है लालची कुत्ता

दादी नानी कहती है-एक दिन एक कुत्ता भूखा पैसा भटक रहा था अचानक एक घर के सामने उसे आधी रोटी का टुकड़ा मिला। वह कुत्ता इधर उधर भाग कर एक शांतिपूर्वक जगह ढूंढने लगा। तभी उसे नदी के ऊपर बना पुल पार करना पड़ा। जब वह पुल पार कर रहा था तब उसकी नजर उसके ही प्रतिबिंब पर पड़ी। प्रतिबिंब को देखकर कुत्ता चौक गया कि पानी में भी दिखाई देने वाले कुत्ते के मुंह में भी आधी रोटी है। उसने सोचा क्यों ना मैं झपट्टा मारकर यह आधा टुकड़ा भी ले लूं।

मन में लालसा आने पर कुत्ता जोर से गुर्रहाने लगा। उसने तुरंत पानी में छलांग लगा दी।परंतु मूर्ख कुत्ते ने जैसे ही छलांग लगाई जो कि उसका ही प्रतिबिंब था वह ओझल हो गया। साथ ही उसके मुंह में दबा आधी रोटी का टुकड़ा भीग कर नदी के नीचे चला गया।मूर्खता के कारण उसका भोजन भी उसे प्राप्त नहीं हो पाया।
शिक्षा- जो कुछ हमारे पास है हमें उसी में ही संतुष्ट रहना चाहिए, अधिक चहां की लालच हमारे पास जो है उसे भी गवा देती है।

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