Chanakya niti for success in life in hindi-Best Chanakya niti

Chanakya niti for success in life in hindi-Best Chanakya niti

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Chanakya niti for success in hindi

दोहा-

जासु चित्त सब जन्तु पर, आलित दया रस माह।
तासु ज्ञान मुक्ति जटा, भस्म लेप कर काह॥१।।

जिस का चित्त दया के कारण द्रवीभूत हो जाता है तो उसे फिर ज्ञान, मोक्ष, जटाधारण
तथा भरमलेपन की क्या आवश्यकता? ॥१॥

दोहा-

एको अक्षर जो शुरु, शिष्यहिं देत जनाय ।
भूमि माहि धन नाहि वह, जोदे अनृण कहाय ।।२।।
यदि शुरु एक अक्षर भी बोलकर शिष्य को उपदेश दे देता है तो पृथ्वी में कोई ऐसा द्र
व्य है ही नहीं कि जिसे देखकर उस शुरु से उत्रण हो जाय ।।२।।

दोहा-

खल काँटा इन दुहुन को, दोई जगह उपाय ।
जूतन
तोडियो, रहिबो दूरि बचाय ॥३॥
ते
दुष्ट मनुष्य और कण्टक, इन दोनों के प्रतिकार के दो ही मार्ग हैं। या तो उनके लिए
पनहीं (जूते) का उपयोग किया जाय या उन्हें दूर ही से त्याग दे॥३॥

दोहा-

वसन दसन राखे मलिन, बहु भोजन कटु बैन ।
सौवे रवि पिछवतु जात, तजे जो श्री हरि ऐन ।।४।।
मेले कपडे पहननेवाला, मैले दाँतवाला, भुक्खड, नीरस बातें करनेवाला और सूर्योदय
तथा सूर्यास्त के समय तक सोने-वाला यदि ईश्वरही हो तो उसे भी लक्ष्मी त्याग देती
हैं॥४॥

Chanakya niti for peace of mind-Hindi

दोहा-

तजहिं तीय हित मीत औ. सेबक थन जब नाहिं।
थन आये बहुरे सब थन बन्धु जग माहिं ।।५।।
निर्थन मित्र को मित्र, स्त्री, सेवक और सो सम्बन्धी छोड़ देते हैं और वही जब फिर
धन हो जाता है तो वे लोग फिर उसके साथ हो लेते हैं। मतलब यह, संसार में धन ही
मनुष्य का बन्धु है।

दोहा-

अन्यार से कमाया हुआ थन केवल दस वर्ष तक टिकता है, व्यारहवाँ वर्ष लगने पर वह
मूल धन के साथ नष्ट हो जाता है।।६।।

दोहा-

खोतो मल समरथ पंह, भलो खोट लहि नीच।
विषो भयो भूषण शिवहि, अमृत राहु कंह मीच ।।७।।
अयोध्य कार्य भी यदि कोई प्रभावशाली व्यक्ति कर गुजरे तो वह उसके लिए योग्य हो
जाता है और नीच प्रकृति का मनुष्य यदि उत्तम काम भी करता है तो वह उसके करने
से अयोध्य साबित हो जाता है। जैसे अमृत भी राहु के लिए मृत्यु का कारण बन गया
और विष शिवजी के कंठ का श्रृल्यार हो गया ।।७।।

दोहा-

दिवज उबरेउ भोजन सोई. पर सो मैत्री सोय ।
जेहि न पाप वह चतुरता, धर्म दम्भ विनु जोय ।।८।।
वही भोजन भोजन है, जो ब्राह्मणों के जीम लेने के बाद बचा हो, वही प्रेम प्रेम है जो
स्वार्थवश अपने ही लोगों में न किया जाकर औरों पर भी किया जाय । वही विज्ञता
(समझदारी) है कि जिसके प्रभाव से कोई पाप न हो सके और वही धर्म धर्म है कि
जिसमें आडम्बरन हो ।।८।।

दोहा-

मणि लोटत रहु पाँव तर, काँच रखो शिर नाय ।
लेत देत मणिही रहे, काँच काँच रहि जाय ।।९।।
वैसे मणि पैरों तले लुढके और काँच माथे पर रखा जाय तो इसमें उन दोनों के विषय
में नहीं कहा जा सकता। पर जब वे दोनों बाजार में बिकने आवेंगे और उनका क्र
-विक्रय होने लगेगा तब काँच काँच ही रहेगा और मणि मणि ही ॥९॥

दोहा-

बहुत विघ्न कम काल है, विढ्या शास्त्र अपार।
जल से जैसे हंस पय, लीजै सार निसार।।१०।।
शास्त्र अनन्त हैं, बहुत सी विढ्यायें हैं, थोडासा समय ‘जीवन’ है और उसमें बहुत से
विघ्न हैं। इसलिए समझदार मनुष्य को उचित है जैसे हंस सबको छोडकर पानी से
दूध केवल लेता है, उसी तरह जो अपने मतलब की बात हो, उसे ले ले बाकी सब छोड दे।

Chanakya niti for life-Hindi

दोहा-

दूर देश से राह बकि, बिनु कारण घर आय ।
तेहि बिनु पूजे खाय जो, सो चाण्डाल कहाय ।।११।।

जो दूर से आ रहा हो इन अभ्यासतों की सेवा किये बिना जो भोजन कर लेता है उसे
चाण्डाल कहना चाहिए ॥११||

दोहा-

पढे चारहूँ वेदहुँ, धर्म शास्त्र बहु बाद ।
आपुहिं जाने नाहिं ज्यों, करिलिहिव्यञ्जन खाद ।।१२।।

कितने लोग चारो वेद और बहुत से धर्मशास्त्र पढ जाते हैं, पर वे आपको नहीं समझ
पाते, जैसे कि कलछुल पाक में रहकर भी पाक का स्वाद नहीं जान सकती ॥१२।।

दोहा-

भवसागर में धज्य है, उलटी यह दिवज नाव ।
नीचे रहि तर जात सब, रूपर रहि बुडि जाय ।।१३।।

यह द्विाजमयी नौका धन्य है, कि जो इस संसाररुपी सागर में उलटे तोर पर चलती है
जो इससे नीचे (नम) रहते हैं, वे तर जाते हैं और जो ऊपर (उथ्दत) रहते, वे नीचे चले
जाते हैं।॥१३॥

दोहा-

सुधा थाम औषधिपति, छवि युत अभीय शरीर।
तकचंद्र रवि ढिा मलिन, पर घर कौन गम्भीर॥१४॥

यद्यपि चंद्रमा अमृत का भाण्डार है. औषधियों का स्वामी है, खयं अमृतमय है और
कान्तिमान् हैफिर भी जब वह सूर्य के मण्डल में पड़ जाता है तो किरण रहित हो
जाता है। पराए घर जाकर भला कौन ऐसा है कि जिसकी लघुता न सावित होती हो॥१४॥

Chanakya niti for self growth-Hindi

दोहा-

अलि नलिनी पति मथुप, तेहि रत मद अलसान ।
परि विदेश विधिवश करे, फूल रसा बहुमान ||१५||

यह एक ओंश है, जो पहले कमलदल के ही बीच में कमिलिनी का बास लेता तहता था
संयोगवश वह अब परदेश में जा पहुँचा है, वहाँ वह कोरेया के पुष्परस को ही बहुत
समझता है ||१५||

दोहा-

क्रोध से तात पियो चरणन से स्वामी हतो जिन रोषते छाती बालसे वृध्दमये तक मुख में
भारति वैशिणि थारे संघाती । मम वासको पुष्प सदा उन तोडत शिवजीकी पूजा होत प्र
भाती । ताते दुख मान सदैव हरि मैं ब्राह्मण कुलको त्याग चिलाती ।।१६।।

ब्राह्मण अधिकांश दरिद्र दिखाई देते हैं, कवि कहता है कि इस विषय पर किसी प्र
श्नोत्तर के समय लक्ष्मी जी भगवान्ढक् से कहती हैं- जिसने क्रुश्द होकर मेरे पिता
को पी लिया, मेरे स्वामी को लात मारा, बाल्यकाल ही से जो रोज ब्राह्मण लोठा वैरिणी
(सरस्वती) को अपने मुख विवर में आसन दिये रहते हैं, शिवाजी को पूजने के लिये जो
रोज मेरा घर (कमल) उजाडा करते हैं, इन्हीं कारणों से नाराज होकर हे नाथ ! में
संदेव ब्राह्मण का घर छोडे रहती हूँ-वहाँ जाती ही नहीं ।।१६।।

दोहा-

बन्धन बहु तेरे अहें, प्रेमबन्धन कछू और।
काठी काटन में निपुण, बँध्यो कमल महँ भोर ।।१७।।

वैसे तो बहुत से बन्धन हैं, पर प्रेम की डोर का बन्धन कुछ और ही है। काठको काटने
में निपुण भ्रमर कमलदल को काटने में असमर्थ होकर उसमें बँध जाता है।।१७।।

दोहा-

कटे न चन्दन महक तजु, वृध्द न खेल गजेश ।
ऊख न पेरे मधुरता, शील न सकुल कलेश ।।१८।।

काटे जाने पर भी चन्दन का वृक्ष अपनी सुगन्धि नहीं छोडता बूढा हाथी भी खेलवाड
नहीं छोडता, कोल्हू में पेरे जानेपर भी ईख मिठास नहीं छोडती, ठीक इसी प्रकार
कुलीन पुरुष निर्धन होकर भी अपना शील और गुण नहीं छोडता ।।१८।।

दोहा-

कोऊभूमिकेमाँहि लघु पर्वत करथार के नाम तुम्हारो र्प यो है।
भूतल वर्ग के बीच सभी ने जो लिखिरथारी प्रसिध्द कियो है।।
तिहँ लोक के धारक तुम को धराकुच अब कहि यह को गिनती है।
ताते बहु कहना है जो वृथा यशलाभहरे निज पुण्य मिलती है।।१९।।

रुक्मिणी भगवान् से कहती हैं हे केशव ! आपने एक छोटे से पहाड को दोनों हाथों से उ
ठा लिया वह इसीलिये स्वर्ण और पृथ्वी दोनों लोकों में गोवर्थनथारी कहे जाने लगे।
लेकिन तीनों लोकों को धारण करनेवाले आपको में अपने कुचों के अगले भाग से ही उ
ठा लेती हूँ, फिर उसकी कोई गिनती ही नहीं होती। हे नाथ ! बहुत कुछ कहने से कोई
प्रयोजन नहीं, यही समझ लीजिए कि बडे पुण्य से यश प्राप्त होता है।।१९।।

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